प्याज का आचार | onion | pickle | kahani | short story in hindi |

प्याज का आचार | onion | pickle | kahani | short story in hindi |
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एक बार एक मोची की तबीयत बिगड़ गई, उसके पेट में बहुत जोर का दर्द हो रहा था, वह गांव के हकीम के पास गया, हकीम जी ने उसकी जांच की, काफी समय तक जांच करने के बाद हकीम जी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। हकीम जी ने मोची से कहा, ” भाई तुम्हें किस तरह की बीमारी है!  मेरी समझ में नहीं आ रही, मैं तुम्हारा इलाज नहीं कर सकता।”

मोची बेचारा निराश होकर वापस घर लौट आया। दो-चार दिन बाद हकीम जी के मन में उत्सुकता पैदा हुई कि देखकर तो आएं कि मोची का क्या हाल है? घूमते-घूमते वह मोची के घर पहुंच गए। वहां मोची को देखकर हकीम जी हैरान रह गए, मोची बिल्कुल ठीक-ठाक था, भला-चंगा था। हैरानी से हकीम जी ने मोची से पूछा, “भाई यह कैसे हो गया ! तुम ठीक कैसे हो गए?”

मोची बोला, “आपने कहा था कि मेरा इलाज नहीं हो सकता, मैं आपका उत्तर सुनकर हताश हो गया था, मुझे लगने लगा था कि मैं बच नहीं पाऊंगा, मैं जब घर में आया तो मेरी नजर मां के बनाए सिरके वाले प्याज के अचार पर पड़ी, मुझे यह प्याज onion वाला अचार pickle बहुत पसंद है, मैंने सोचा मरने से पहले जी भर के अचार तो खा लूँ, मैं  मर्तबान लेकर अचार खाने बैठ गया, जैसे-जैसे मैं अचार खाता गया, मेरी तबीयत ठीक होने लगी, कुछ ही देर में मैं करीब किलो भर अचार खा गया और एकदम ठीक होकर काम करने लगा।”

“वाह भाई वाह !” कमाल हो गया ! आज तो एक नया नुस्खा सीखने को मिला, ” हकीम Doctor जी बोले।

घर लौटकर हकीम जी ने अपनी बही में दर्ज किया कि जब किसी की तबीयत खराब हो, पेट दर्द हो रहा हो, बीमारी समझ में ना आए तो उसे एक किलो सिरके का प्याज वाला अचार खिलाएं, वो ठीक हो जायेगा।

कुछ दिनों बाद हकीम जी की दुकान पर एक दर्जी आया। उसके पेट में भी बहुत दर्द हो रहा था, तबीयत भी ठीक नहीं थी, हकीम जी ने उसकी जांच की। दर्जी की बीमारी हकीम जी की समझ में नहीं आ रही थी। नाक-कान, आंखें-जीभ, गला सब कुछ ठीक था, सारे लक्षण मोची की बीमारी की तरह थे। हकीम जी तुरंत एक किलो सिरके के प्याज का अचार ले आए और दर्जी को खाने को कहा।

दर्जी tailor ने अचार खाना शुरु कर दिया, अचार खाने पर दर्जी की तबीयत health ज्यादा बिगड़ने लगी, लेकिन हकीम जी को भरोसा था आचार पर और दर्जी को भरोसा था हकीम जी पर। दर्जी अचार खाता गया और तड़पता रहा। हालत यह हो गई थी कि दर्जी से अब अचार नहीं खाया जा रहा था। लेकिन हकीम जी मान नहीं रहे थे। वो दर्जी को पूरा आचार खाने को बोल रहे थे। आचार ख़त्म होने से पहले दर्जी की मौत हो गई।

उसी दिन हकीम साहब ने अपनी बही पर दर्ज किया,

” सिरके के प्याज वाला अचार जहां मोचीयों के लिए अक्सीर दवा है वही दर्जियों के लिए यह जहर है, लिहाजा देने से पहले पूछा जाए कि मरीज करता क्या है?”

Moral of story कहानी का सार :- नीम हकीम खतरा जान। दुनियां में वैसे ऐसे हकीमों की कमी नहीं है। न जाने कितनी जानें ऐसे सड़क-छाप हकीमों ने ले ली हैं। कहानी का सार यह है कि हम अपने स्वास्थ्य के लिए किसी योग डॉक्टर के पास ही जाएँ। कहानी यह भी सन्देश देती है कि अगर हम शरीर के रोग के साथ-साथ मन के रोग का इलाज करना चाहते हैं तो भी हमें वैद के पास जाना होगा। उस वैद को ‘गुरु’ कहा जाता है। आजकल गुरु भी संसार में बहुत हैं। सच्चा गुरु ही मन के रोगों का इलाज कर सकता है। झूठे गुरु मनुष्य का बेड़ा गर्क कर देते हैं।

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